भक्त मन्दिर में गया वहां महन्त जी माला जप रहे थे (लेकीन महन्त जी का मन किन्हीं विचारों में डूबा हुआ था) भक्त देखकर वापिस चला गया कुछ देर बाद वह भक्त फिर आया। महन्त जी से कहने लगा आपका चेला तो बडा मजाकिया है। आपके बारे में ऐसा ऐसा कहता था। मैने जब देखा आप भजन कर रहे थे।
गुरु महन्त जी बोले भक्त यह बच्चा ही तो है कह दिया होगा। बुरा न मानना तभी भक्त के जाने के बाद महन्त जी ने जेठू जी को अपने पास बुलाया और कहा अब एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती क्योंकि तुम्हारी शाक्ति मेरे से ज्यादा हो गई है। अतः यह स्थान तुम संभालो हम कहीं और चलते है। जेठू जी ने अपने गुरु महन्त जी से हाथ जोड जोडकर बडी नम्रता से कहा आप इस स्थान की शोभा बढ़ाँए। अपने गुरु के चरणों का स्पर्श करके हुडिया मन्दिर से ताजपुर आ गये।
यहाँ रहकर इन्होंने एक तालाब का निर्माण करवाया इसके पश्चात ताजपुर से चलकर खालडा आ गए। यहां रहकर इन्होने योग साधना की और एक जौंहड खुदवाया।
नसीबपुर गांव की एक महिला इनके लिए भोजन लेकर तथा इनके दर्शनों के लिए प्रतिदिन खालडा आती थी। एक दिन वह प्रतिदिन की भांति खालड़ा आ रही थी उस असहाय को रास्ते मे चार बदमाशों ने घेर लिया और दुर्वचन कहने लगे। तभी वह सभी दृष्टीहिन हो गये और इधर-उधर भटक कर रोने लगे। जब वह भक्तमहिला भोजन लेकर बाबा जेवू जी के पास पहुँची तो जेवू जी उससे बोले माई अब तो हम तरे गांव चलकर ही भोजन करेंगे इतना कहकर बाबा उस श्रद्धालू महिला के > साथ नसीबपुर आ गये। यही आकर उसके हाथ का भोजन ग्रहण किया। नसीबपुर आकर इन्होंने तपस्या शुरु कर दी। कुछ समय पश्चात इन्हाने एक जौहड खुदवाना शुरु किया। हर रोज ये शाम को मजदूरों को उनकी > मजदूरी दे दिया करते थो एक दिन उन मजदूरों के सामने ही धरती में से पैसे निकाल कर उनकी मजदूरी दे दी। कुछ मजदुरों के मन मे लोभ जाग गया। उन्होने आपस मे विचार किया क्यो न रात को आकर बाबाजी का खजाना निकाल लें, और फिर मजदूरी आदि का छोटा काम भी नहीं करना पडेगा। रात को खुदाई करके खजाने को खोजने लगे। वे बहुत देर तक परिश्रम करते रहे। लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा। उन्होने तो सोचा था कि खजाना मिल जाएगा किसी के सामने हाथ नहीं पसारने पड़ेंगे वे सब खाली लौट गये और कहने लगे कि यह सब बाबा जी की माया थी।
दुसरे दिन जब शाम को जेठू जी बाबा ने उन मजदुरो की मजदूरी दुगनी कर दी। सब मजदूर उनकी और कृतज्ञता की दृष्टी से देखने लगे। बाबाजी बोले भक्तों रात को तुमने बहुत काम किया था इसलिए दूगनी मजदूरी दे रहा हूँ। सब मजदूर जंतू बाबा के चरणों में गिर पडे और अपने अपराध के लिए क्षमा मांगने लगे बाबा हमे क्षमा कर दें ऐसा अपराध हम अपने जीवन में कभी नहीं करेंगे। बाबा जी ने उनको उनकी अज्ञानता के कारण क्षमा कर दिया।
जेठू जी के पास भगवान नृसिंह जी की एक मूर्ति थी। उसकी पूजा का कार्यभार एक धर्मज्ञ विद्धान ब्राह्मण को सौप रखा था। वह >प्रतिदिन बड़े प्रेम और श्रद्धा से पूजा करता था। गाँव नसीबपुर में जोहड़ बनवाने का काम चल रहा था। उन्हीं दिनों गांव के श्रद्धालु भक्तों ने
आपस में निश्चय किया कि एक मन्दिर बनवाएं और वहां बाबा जी को लाएं जोहड़ के साथ-साथ मन्दिर भी बनकर तैयार हो गया। गांव के सब नर-नारी बाबा जेठू जी को बडी श्रद्धा भाव से मन्दिर में ले आए।
बाबा की प्रेरणा से भगवान नृसिंह जी की प्रतिमा की बड़ी
धूम-धाम से प्राण प्रतिष्ठा कर दी गई। इसके पश्चात एक विद्वान ब्राम्हण को मन्दिर की पूजा-अर्चना का कार्यभार सौंप दिया गया।
बहुत दूर जब किसी सेठ की नाव नदी के अथाह जल में डूबने लगी तो वह बेचारे बहुत घबराये। नाव में बैठे आदमियों को इस संकट से छुटकारा पाने का कोई भी उपाय नहीं सूझ रहा था। तभी उनमें से एक व्यक्ति जो जंतू जी की देन शक्ति को जानता था बोला नसीबपुर वाले जेठू बाबा को सच्चे मन से याद करो वही हम सबको नदी में डूबने से बचा सकते है, तब सेठ जी ने और साथ बैठे लोगों ने बाबा जी का स्मरण किया। इधर बाबा जी चौपड़ खेल रहे थे। तभी वे कहने लगे मेरी तबीयत ठीक नहीं है, मेरा पासा तुम फेंको। बाबा जी ने पास पड़ा कम्बल ओड़ लिया और नाव को किनारे पर लगा दिया। नाव को किनारे लगाते वक्त बाबा की पीठ से खून बहने लगा। कम्बल हटने पर जब चौपड़ खेलेने वालों का ध्यान उस और गया तब बोले बाब जी यह खून कैसे आ गया। बाबा ने कहा कोई मच्छर काट गया होगा। सब ठिक हो जायेगा। निश्चित होकर खेलो।
कई दिनो के बाद सेठ जी बाबा जी के पास पहुँचे। नाव डूबते समय जो संकल्प मन में लिया था उसमें से कुछ कम करके चढाया । लोभ ने लाला जी को विचलित कर दिया था। सेठ जी ने सबके सामने संकल्प का स्मरण कराया। शरम के कारण सेठ जी की आंखे नीचे झुक गई। बाबा ने जैसा आदेश दिया वैसा ही सेठ ने किया। अटेली मण्डी के पास गढी गांव के लाला जी एक मुकदमे में उलझ गए। गांव के सभी लोग कहने लगे लाला जी को सजा होगी। नार-नौल के पास पटिकरा गांव का मुनीम लाला के पास काम करता था, उसने बताया लाला जी जेठू बाबा को याद करो। अगर बाबा ने तुम्हारी प्रार्थना सुन ली तो तुम सजा से बच सकते हो। सेठजी ने बडी विनम्रता से बाबा को याद किया, बाबा जी आप
मुझे इस उलझन से निकालो मेरी आने वाली पीढीयों आपको मानती रहेगी जात जडूला करती रहेगी। अंत में सेठ जी मुकदमें में जीत गये ।। उनके वंशज आज भी भाद्रपद की शुक्ल पक्ष कि द्वादशी को उनकी समाधि पर जाकर जेटू बाबा को झुककर नमन करते है। इस दिन को बावनी द्वादशी भी कहते हैं।
जेठू बाबा जी को समाधि लिए दो सौ वर्ष से कुछ ऊपर हो गया है। यानी सम्वत (विक्रमी) १८४८ बावनी द्वादशी को ब्रहम मुहर्त में समाधी ली थी। जिस जौहड का निर्माण बाबा जी ने अपने पवित्र हाथों से करवाया था उसी जाँहड के किनारे बाबा ने जीवित समाधि ली थी।
अपने लम्बे जीवन में उन्होने अनेक चमत्कार दिखाए। वैसे ही चमत्कार श्रद्धालू लोगों को आज भी दिखाई देते है।
बाबा जेठू जी की पवित्र समाधि पर प्रतिवर्ष भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन समस्त देश से असंख्य श्रद्धालू भक्तजन दरबार में आते हैं। और इस दिन बाबा की झाँकी बड़ी धूम-धाम से निकाली जाती है और व्दादशी के दिन शानदार मेले का आयोजन होता है। दूर-दूर से खेल प्रेमी आते है। मेला कमेटी की देख-रेख में कुश्तियों तथा अन्य खेलों का प्रबंध होता है। भक्तगण मंदिर में प्रसाद ग्रहण करते है ।। एकादशी को रात्रिको भजन कीर्तन होते है। भक्तगण सुनकर धर्म लाभउठाते है और सुबह जेठू जी व्दारा बनाए जौहड में स्नान करते है। और बाबा जी की समाधि पर श्रद्धा के पुष्प चढाते है।
बाबा जेठू जी की पवित्र समाधि और मन्दिर के जीर्णोद्धार का कार्य सम्वत १९९२ में (विक्रमी) छिन्दवाडा (मध्यप्रदेश) वाले स्व. सेठ श्री शिवकरण दास ने किया था और मन्दिर की पूजा अर्चना का भार पं. सुन्दर दास जी को सौंपा गया था। आज भी पंडित सुन्दर दास जी के वंशज पूजा अर्चना कर रहे है।
श्री जेठू बाबा जी के जीवन के संबंध में जितना जान पाए उतना लिखा है गलती के लिए क्षमा करे।